दिल्ली में MCD पार्किंग बनी ‘वसूली का अड्डा’, अधिकारियों की शह पर माफिया राज?

नई दिल्ली | देश की राजधानी में निगम अधिकारियों की नाक के नीचे जनता की जेब पर दिनदहाड़े डकैती डाली जा रही है। MCD द्वारा अधिकृत पार्किंग स्थल अब पार्किंग माफियाओं के सुरक्षित ठिकाने बन चुके हैं। नियमों को ताक पर रखकर यहाँ न केवल ओवरचार्जिंग हो रही है, बल्कि जीएसटी चोरी और अवैध कब्जों का खेल भी धड़ल्ले से जारी है।

भ्रष्टाचार का ‘नेटवर्क’: कौन है मास्टरमाइंड?

​सूत्रों के हवाले से मिली जानकारी के अनुसार, इस पूरे खेल को निगम के कुछ उच्चाधिकारियों का संरक्षण प्राप्त है। आरोप है कि RP सेल के एडीसी (ADC) राजीव और संबंधित एरिया इंस्पेक्टरों की देखरेख में यह अवैध कारोबार फल-फूल रहा है।

​इस कड़ी में सबसे चौंकाने वाला नाम मुकेश तिवारी का सामने आ रहा है। कहने को तो मुकेश तिवारी सिविल लाइन जोन में ‘कॉन्ट्रैक्ट जेई’ के पद पर तैनात हैं, लेकिन चर्चा है कि उनका असली काम एडीसी के लिए अवैध वसूली करना है। सूत्रों का दावा है कि मुकेश तिवारी का रसूख इतना है कि वे उगाही के साथ-साथ टेंडर क्लर्क और जोन इंचार्ज की जिम्मेदारियां भी संभाल रहे हैं।

इन इलाकों में चल रहा है ‘जंगलराज’

​पार्किंग माफियाओं ने दिल्ली के कई प्रमुख इलाकों को अपना गढ़ बना लिया है। मुख्य रूप से इन जगहों पर भारी अनियमितताएं देखी जा रही हैं:

  • शास्त्री पार्क: जगप्रवेश अस्पताल और एक्वा होटल के पास की पार्किंग।
  • गीता कॉलोनी: श्मशान घाट, मुस्कान चौक और साईं मंदिर पार्किंग।
  • मोरी गेट: मंदिर वाली और सूखा पेड़ पार्किंग।
  • आनंद विहार: पार्किंग नंबर 2।
  • बुलंद मस्जिद: मछली मार्केट पार्किंग।

कैसे लूटी जा रही है जनता?

​इन पार्किंग स्थलों पर नियमों की धज्जियां उड़ाने के लिए कई तरीके अपनाए जा रहे हैं:

 

    1. अवैध कब्जा: टेंडर में निर्धारित जगह से कहीं ज्यादा एरिया घेरकर पार्किंग चलाई जा रही है।
    2. डिजिटल स्लिप का अभाव: पब्लिक को बिना किसी वैध डिजिटल रसीद के मनमाने पैसे देने पर मजबूर किया जा रहा है।
    3. जीएसटी की चपत: नकद वसूली के जरिए सरकार को मिलने वाले टैक्स (GST) की सरेआम चोरी हो रही है।
    4. लोडिंग-अनलोडिंग का खेल: पार्किंग स्थलों का इस्तेमाल माल की लोडिंग और अनलोडिंग के लिए किया जा रहा है, जो नियमों के विरुद्ध है।

बड़ा सवाल: जब MCD के इंस्पेक्टर लगातार दौरों पर रहते हैं, तो उनकी आंखों के सामने यह सब कैसे संभव है? क्या उनकी चुप्पी का दाम चुकाया जा रहा है?

निगमायुक्त से जवाब की उम्मीद

​हैरानी की बात यह है कि जहाँ एक तरफ भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी हो रही हैं, वहीं निगमायुक्त संजीव खिरवार इस पूरे मामले से बेखबर नजर आ रहे हैं। क्या दिल्ली की जनता को इन माफियाओं के भरोसे छोड़ दिया गया है?